बार बार फोन चेक करने, फोन से दूर होने पर बेचैनी और काम के बीच में भी फोन देखते रहने की आदत, आपको बीमार बना सकती है। अनिद्रा से लेकर याददाश्त को कमजोर करने तक कैसे स्क्रीन के साथ जुड़ाव शारीरिक-मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है। यहां जानें इसके प्रयोग का संतुलित तरीका क्या है।
ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। अगर स्क्रीन पर घूरते हुए ईमेल, यूट्यूब, ग्रुप चैट के बीच घंटों विचरते रहते हैं और आपको लगता है कि यह जरूरी काम है, तो तय मानिए आपको फोन की लत लग चुकी है, जो किसी ड्रग्स से कम नहीं है। आभासी दुनिया में भटकने की यह आदत डिजिटल डिमेंशिया से लेकर टेक नेक जैसी गंभीर बीमारियों की नींव तैयार कर रही है। भारत में सवा अरब स्मार्टफोन और 95 करोड़ से अधिक इंटरनेट यूजर्स हैं। ईवाई की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय यूजर्स प्रतिदिन औसतन पांच घंटे इंटरनेट मीडिया, गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग पर खर्च कर देते हैं। वर्ष 2024 में भारतीयों ने 1.3 खरब घंटे स्मार्टफोन पर बिताए।
इसके अत्यधिक इस्तेमाल से न केवल दिमाग की क्षमता प्रभावित हो रही है बल्कि नींद बाधित होने और पाचन समस्याएं भी देखने में आ रही हैं। लगातार स्क्रॉल करने, फिल्टर, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब पर ऑटोप्ले जैसे फीचर्स घंटों का समय खर्च करा देते हैं और आपको पता भी नहीं चलता। जिसे आप मनोरंजन समझते हैं वह डिप्रेशन, एंग्जाइटी, बॉडी डिस्मोर्फिया जैसी स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ बन रहा है।
एआई के दौर में चुनौती और भी बड़ी है। पावरफुल होते चैटबॉट और वर्चुअल कैंपेनियन आपको इस हद तक बांध रखते हैं कि आपको वास्तविक दुनिया के रिश्ते भी गैरजरूरी लग सकते हैं। यह उन परिवारों के लिए एक महामारी है, जो अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि तकनीकें कैसे उनके बच्चों की परवरिश का तरीका बदल रही है।
दिमाग पर कैसे होता है असर?
तकनीकों के जाल में फंस जाने के बाद यह दिमाग के रिवॉर्ड सर्किट को किसी नशीली दवा की तरह प्रभावित करता है। जब भी आप इंटरनेट मीडिया फीड को रिफ्रेश करते हैं या वीडियो गेम में एक राउंड आगे बढ़ते हैं तो दिमाग को डोपामाइन का संकेत मिलता है, जो बार-बार ऐसा ही करने के लिए आपको प्रेरित करता है। यह आवेग असंवेदनशीलता बढ़ाता है और प्रीफ्रंटल कार्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो योजना बनाने और आत्म-नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है) को कमजोर कर सकता है। इससे इच्छाओं पर नियंत्रण बहुत मुश्किल हो जाता है। इंटरनेट गेमिंग या इंटरनेट मीडिया डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों की ब्रेन इमेजिंग पर हुए अध्ययन बताते हैं कि मस्तिष्क में संरचनात्मक और कार्यात्मक बदलाव आ रहे हैं, जो अक्सर जुए और अन्य व्यवहारिक लतों के मामलों में देखे जाते हैं।
खराब होती नींद बना रही है बीमार
लगातार ब्लूलाइट के सामने रहने से रात की नींद में खलल पड़ता है और शरीर की जैविक घड़ी का संतुलन बिगड़ता है। अगर आप देर रात स्क्रॉल करते रहते हैं, तो यह सोने के समय को बढ़ा देता है। स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद के लिए जिम्मेदार हार्मोन मेलाटोनिन को दबाती है। इससे सुबह उठने पर आपको लगता है कि रात की नींद सही ढंग से पूरी नहीं हुई है। साथ ही सोने-जागने का समय भी अव्यवस्थित होता है और दिन में आपको हर समय थकान महसूस होती है। अगर आप छह घंटे से कम सोते हैं तो धीरे-धीरे याददाश्त कमजोर होने लगती है और डिमेंशिया का जोखिम बढ़ सकता है।
पेट की समस्या के लिए भी जिम्मेदार
अगर आपकी नींद खराब होगी तो इसका असर पाचन पर भी होगा। दिमाग और आंत के बीच एक जुड़ाव होता है, जो अनिद्रा के चलते असंतुलित हो सकता है। खराब नींद आंत के माइक्रोबायोम को बिगाड़ती है। इससे आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया कम हो जाते हैं। सेरोटोनिन का स्तर प्रभावित होने, चिंता और मूड खराब होने जैसी समस्याएं आंतों की कार्यप्रणाली के लिए अवरोधक हैं। खराब नींद और पाचन की समस्या के चलते पूरे शरीर में सूजन बढ़ सकती है। इससे दिमाग तेजी से बूढ़ा होने लगता है, साथ ही संज्ञानात्मक क्षमता में तेजी गिरावट होने लगती है।
कैसे पहचानें रेड फ्लैग
अगर आप सोच रहे हैं कि स्क्रीन के साथ रिश्ता नई मुसीबतों का कारण बन गया है तो इसे आप खुद से कुछ सवाल पूछकर पता कर सकते हैं।
ऑफलाइन होने पर परेशानी महसूस करते हैं?
अगर ऐसा है तो यह इस बात का संकेत हैं कि आपका खुद पर नियंत्रण खत्म हो रहा है। अगर कोई योजना बनाने और उसे पूरा करने के दौरान फोन अवरोध बन रहा है, तो फोन के साथ अपने रिश्ते को लेकर सतर्क हो जाएं।
ऑनलाइन एक्टिविटी के बारे में कितनी बार सोचते हैं?
अगर ऑफलाइन होने पर भी आपका मन ऑनलाइन एक्टिविटी में भटक रहा है तो यह इस बात का संकेत है कि आप स्क्रीन एडिक्ट हो चुके हैं। जब काम, बातचीत या आराम के समय भी टेक्नोलॉजी आपके दिमाग पर हावी हो, तो यह आपके सोच से कहीं अधिक मानसिक जगह को घेर रही है।
ऑनलाइन नहीं होने पर बेचैनी, चिड़चिड़ापन होता है?
इंटरनेट से डिस्कनेक्ट होने पर झुंझलाहट सामान्य बात है, पर ऑनलाइन नहीं होने पर बेचैनी, गुस्सा, घबराहट खतरे का संकेत हैं।
क्या खेल, पुराने शौक या परिवार के साथ रहने का मन नहीं होता?
अगर लोगों से बात करने, स्पोर्ट्स में शामिल होने से अधिक आपका मन स्क्रॉलिंग, गेमिंग में लगने लगा है तो मान लीजिए आभासी दुनिया आपकी वास्तविक दुनिया को समेटने लगी है।
क्या लोगों से ऑनलाइन एक्टिविटी को छुपाते हैं?
अपने स्क्रीन टाइम को छिपाना या कम करके बताना, जैसे किसी के कमरे में आने पर तुरंत विंडो बंद कर देना या देर रात तक ऑनलाइन रहने की बात को हल्का करके बताना आपके ऑनलाइन समस्याओं में उलझने का संकेत है।
तकनीक का हो संतुलित प्रयोग
नए शोध बताते हैं कि स्मार्टफोन के अत्यधिक इस्तेमाल से दिमाग की बनावट बदल रही है। खासकर, सेरेब्रल कार्टेक्स का पतला होना, भावनाओं को नियंत्रित करने वाले हिस्से जैसे आर्बिटोफ्रंटल कार्टेक्स और एंटीरियर सिंगुलेट कार्टेक्स में ‘ग्रे मैटर’ की मात्रा में कमी होना चिंताजनक है। इन बदलावों के चलते बुढ़ापे के लक्षण जल्दी विकसित होने लगते हैं। हालांकि, इनके पीछे अन्य कारण भी जिम्मेदार होते हैं।
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डॉ. नितिन आनंद, प्रोफेसर, क्लीनिक साइकोलाजी, निमहंस, बेंगलुरु
मस्तिष्क में कार्यात्मक परिवर्तन
इससे दिमाग की क्षमता में गिरावट आ रही है। स्मार्टफोन पर अत्यधिक निर्भरता और ध्यान भटकने के चलते एकाग्रता में कमी होने, भूलने जैसी समस्याएं होने लगी हैं। इन बदलावों को ‘डिजिटल डिमेंशिया’ कहा जाता है यानी यह मस्तिष्क में व्यवहारिक और कार्यात्मक बदलाव का संकेत है।
नींद में बाधा और डिमेंशिया का खतरा
नोटिफिकेशन, मल्टीटास्किंग और ब्लू लाइट एक्सपोजर के चलते नींद और सर्केडियन रिदम बाधित होता है। इससे डिमेंशिया के खतरे से जुड़े सूजन वाले मैकेनिज्म की आशंका बढ़ती है।
तकनीक का संतुलित प्रयोग
स्मार्टफोन के लिए दैनिक प्रयोग की सीमा होनी चाहिए, ताकि मानसिक सेहत प्रभावित न हो। इससे एकाग्रता में भी सुधार होगा। पैसिव स्क्रॉलिंग, गैर जरूरी नोटिफिकेशंस को टर्नआफ करने, इंटरनेट मीडिया फीड्स को कम करने और नींद के व्यवधानों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए, इससे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली बेहतर बनी रहती है।
वेलनेस टूल्स से नियंत्रित करें स्क्रीनटाइम
स्क्रीन की लत से निजात पाने में स्मार्टफोन में बिल्ट इन वेलनेस टूल्स काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं। बार-बार नोटिफिकेशन देखने या मेल चेक करने या फिर बिना बात के इंटरनेट मीडिया पर स्क्रॉलिंग करने के चलते अगर हर रोज घंटों का समय जाया हो जाता है, तो इसके लिए स्मार्टफोन में ही मौजूद कुछ खास तरह के टूल्स का प्रयोग कर सकते हैं। इनसे आप डेली यूज के बारे में जानने के साथ अपनी एकाग्रता को भी वापस पा सकते हैं। एपल और गूगल दोनों ही इकोसिस्टम में ये टूल्स मौजूद हैं। आइओएस26 और एंड्रॉयड 16 में तो खास फीचर्स भी जोड़े गए हैं, जो आपको फोन नीचे रखने में सहायता कर सकते हैं।
एंड्रॉयड फोन
टाइम लिमिट को सेट करें
अगर आपके पास गूगल, सैमसंग या अन्य कोई एंड्रॉयड स्मार्टफोन है तो आप टाइम लिमिट को सेट कर सकते हैं।
- एंड्रॉयड की सेटिंग को ओपन करें। इसके बाद ‘डिजिटल वेलबीइंग एंड पैरेंटल कंट्रोल’ पर टैप करें।
- यहां स्क्रीन टाइम ग्राफ पर टैप करें।
- उस एप को चुनें जिसके लिए टाइम लिमिट सेट करना चाहते हैं।
- इसके बगल में मौजूद ‘आवरग्लास’ आइकन पर टैप करें।
- प्रत्येक एप के लिए कितना टाइम देना चाहते हैं, उसे यहां सेट कर ओके पर टैप करें।
बेडटाइम मोड सेट अप करें
एंड्रॉयड फोन, टैबलेट में बेडटाइम रूटीन सेट करके स्क्रीन टाइम में कटौती की जा सकती है। रात में फोन रखने के लिए निर्धारित समय होते ही आपको यह अलर्ट कर देगा।
- एंड्रॉयड की सेटिंग में जाकर ‘डिजिटल वेलबीइंग एंड पैरेंटल कंट्रोल’ पर टैप करें।
- यहां बेडटाइम मोड ऑप्शन को चुनें और बेडटाइम रूटीन पर टैप करें।
- यहां कस्टम शिड्यूड या मनमाफिक टाइम फ्रेम को चुनें।
आईफोन, आईपैड और आईमैक के लिए एप टाइमर सेट करें
सेटिंग में एप्स के लिए टाइमर जोड़कर प्रत्येक एप के लिए समय तय कर सकते हैं। समय पूरा होते ही एप्स आपको स्क्रॉलिंग से रोक देगा और समय पूरा होने का अलर्ट देगा। इससे पहले स्क्रीन टाइम नोटिफिकेशन को अनुमति देनी होगी। इस सेटिंग को सेटिंग्स > नोटिफिकेशन > स्क्रीन टाइम में जाकर देखें और सुनिश्चित करें कि आपने ‘अलाउ नोटिफेकशन’ और ‘ टाइम सेंसटिव नोटिफिकेशंस’ को चालू किया हुआ है।
- टाइम लिमिट तय करने के लिए सेंटिंग में जाकर स्क्रीन टाइम पर टैप करें।
- इसके बाद एप लिमिट्स और फिर एड लिमिट पर टैप करें।
- उन एप्स की कैटेगरी या अलग-अलग कैटेगरी को चुनें, जिनके लिए आप टाइमर सेट करना चाहते हैं।
- ऊपर दाएं कोने में नेक्स्ट पर टैप करें।
- स्क्रॉल करें और हर एप पर आप जितना समय देना चाहते हैं, उसे सेट करें।
- अगर लिमिट का शेड्यूल कस्टमाइज करना चाहते हैं, तो कस्टमाइज डेज पर टैप करें।
- ऊपर दाएं कोने में एड पर टैप करें।
- टाइम लिमिट पूरा होने पर एपल आपको नोटिफिकेशन भेजेगा कि पांच मिनट शेष हैं। यहां आप लिमिट बदल भी सकेंगे।
डाउन टाइम सेट करें
‘डाउनटाइम’ यानी वह समय जब आप अपना डिवाइस को एक तरफ रखकर कुछ और करते हैं। यह सेटिंग आपके चुने हुए आराम के समय की शुरुआत होते ही आपको अलर्ट कर देगी।
- इसके लिए सेंटिंग में जाकर स्क्रीन टाइम पर टैप करें।
- डाउनटाइम पर टैप करें और शिड्यूल्ड के बगल में दिए गए विजेट को ऑन करें।
- इसके बाद अपना डाउनटाइन शेड्यूल सेट करें।
Source : https://www.jagran.com/technology/tech-guide-phone-screen-addiction-health-risks-and-digital-dementia-impact-40207315.html
